काव्यसंग्रह

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  • Sci fi poems

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    साय फाय (सायन्स फिक्शन) का हॉलीवुड सिनेमा तो आपने बहुत देखा होगा लेकिन ये ‘साय फाय पो’ क्या है?
    पिछले २-३ दशकों से होने वाली तकनिकी तब्दीलियों में, बदलनेवाला समाज, बदलनेवाले आप और बदलनेवाला मैं; ये समझने के लिए काफी हैं कि आनेवाले २-३ दशकों में क्या होगा और फिर आने वाले २-३ सदियों में क्या होगा?
    मोबाइल की हथकड़ी से बंधी इंसानियत मशीन के सामने और कितने घुटने टेकेगी?
    हम कितनी तेजी से उस भविष्य की ओर बढ़ रहें हैं ना?
    ये कवितायें आपको उसी भविष्य में लेकर जाती हैं ।अकल्पनीय टेक्नोलॉजी से घिरे मनुष्य जीवन की ये कवितायें हैं।
    रोबोट होगा, एलियंस आएंगे, उड़नेवाली कार होगी, इंसान दूसरे प्लेनेट पे बसने जाएगा … जो आज नामुमकिन लग रहा है, वो सब कुछ होगा। इसी सच्चाई के बीच इंसान की एहमियत क्या होगी? दिल का क्या होगा? इश्क़ का क्या होगा? क़ानून का क्या होगा? क्या सब कुछ आसाँ हो जाएगा या सब कुछ मुश्किल हो जाएगा?
    इसी आनेवाली सदी में शायर भी होगा ना? उसी की ये नज़्में हैं …यूँ समझिये कि टाईम मशीन से आया था और मुझे किताब थमाकर गया है; होशियार करने के लिए। बताकर गया – “हो सके तो मूड जाओ। जहां बढ़ रहें हो , रास्ता ठीक नहीं है।”
    क्या शायर भी बदलता है वक़्त और टेक्नोलॉजी के साथ? नहीं, वो किसी का गुलाम नहीं होता। इंसानियत और इश्क़ के सामने, वो तो खुदा की भी नहीं सुनता। समाज का आईना होता है वो; समाज का भरोसेमंद ‘डेटाबेस’ होता है वो।
    आईये, चलतें हैं – भविष्य में।
    वन्स अपॉन अ टाइम इन फ्यूचर …

  • चौराहा

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    100.00

    हर वक्त एक मोड़ दे जाता हैं, एक चौराहा…कहाँ जाए, ये तय करना होता हैं उलझन…
    उस उलझन में लफ़्ज दे जाते सहारा…
    फिर सफ़र हो जाता हैं आसान…
    ये चौराहा, कभी मेरा… कभी आपका…!

    – संगीता शेम्बेकर

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